● ऑक्सीजन का लेवल गिरने पर हालत को सुधारने में 80 फीसदी तक कारगर है प्रोन पोजिशन तकनीक

● डॉक्टरों ने कोविड के मरीजों को सांस लेने में दिक्कत होने पर इस तकनीक को आजमाने की सलाह दी

● संक्रमण की गंभीर स्थिति में राहत मिलती है

● जब फेफड़ों पर सकारात्मक दबाव बढ़ता है तो उनका व्यवहार बदलता है

कोरोनावायरस से पीड़ित मरीजों में सांस लेना मुश्किल हो जाता है। चीनी शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में बताया है कि ऐसे मरीजों को अगर उल्टा लिटाया जाए तो सांस लेना आसान हो जाता है। ऐसी स्थिति में पेट के बल लेट जाएं और मुंह को तकिए पर रखें। यह रिसर्च कोरोनावायरस के गढ़ वुहान में इस वायरस से जूझ रहे मरीजों पर की गई है। हर चिकित्सा प्रणाली के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने प्रोन पोजिशन को अस्पतालों में भर्ती कोरोना मरीजों के लिए ‘संजीवनी’ बताया है।

बदलता है फेफड़ों का व्यवहार

अमेरिकन जर्नल ऑफ रेस्पिरेट्री एंड क्रिटकल केयर मेडिसिन में प्रकाशित शोध के मुताबिक, वेंटीलेटर पर कोरोना पीड़ित का उल्टा लेटना फेफड़ों के लिए बेहतर है। चीन में साउथवेस्ट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता हैबो क्यू के मुताबिक, जब फेफड़ों पर सकारात्मक दबाव बढ़ता है तो उनका व्यवहार बदलता है। ऐसी स्थिति में मरीज राहत महसूस करता है।

क्यों बनाएं प्रोन पोजीशन

सांस लेने में तकलीफ होने पर इस अवस्था में 40 मिनट लेटते हैं तो आक्सीजन का लेवल सुधरता है। पेट के बल लेटने से वेंटिलेशन परफ्यूजन इंडेक्स में सुधार आता है। डॉक्टरों ने कोविड के मरीजों को सलाह दी है कि सांस लेने में दिक्कत होने पर इस तकनीक को आजमा सकते हैं।

इस पोजीशन का इस्तेमाल एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस की हालत में किया जाता है, ताकि ऑक्सीजन सर्कुलेट की जा सके। ऐसी स्थिति में फेफड़ों के निचले हिस्से में पानी आ जाता है।

प्रोन पोजिशन बनाते हुए ये ध्यान रखें

  • गर्दन के नीचे एक तकिया, पेट-घुटनों के नीचे दो तकिए लगाते हैं और पंजों के नीचे एक। हर 6 से 8 घंटे में 40-45 मिनट ऐसा करने के लिए कहते हैं।
  • पेट के बल लिटाकर हाथों को कमर के पास पैरलल भी रख सकते हैं। इस अवस्था में फेफड़ों में खून का संचार अच्छा होने लगता है। फेफड़ों में मौजूद फ्लुइड इधर-उधर हो जाता है और यहां तक ऑक्सीजन पहुंचने लगती है।
  • प्रोन पोजिशन सुरक्षित है और खून में ऑक्सीजन का लेवल बिगड़ने पर कंट्रोल करने का काम करती है। यह डेथ रेट को भी घटाती है।
  • एक्सपर्ट के मुताबिक, आईसीयू में भर्ती मरीजों को प्रोन पोजिशन से बेहतर रिजल्ट मिलते हैं। वेंटिलेटर न मिलने पर यह सबसे अधिक कारगर तकनीक है। इससे 80 फीसदी तक नतीजे वेंटिलेटर जैसे ही मिलते हैं।

वुहान में 12 कोरोना पीड़ितों पर हुई रिसर्च

वुहान के 12 कोरोना पीड़ितों पर यह रिसर्च की गई। रिपोर्ट में सामने आया कि नए कोरोनावायरस के मरीज एक्यूट रेस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम से जूझते हैं। जिन्हें मशीनों के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। चीन में भी कोरोना के जो मरीज भर्ती हुए वो भी इस सिंड्रोम से जूझ रहे थे। 

फरवरी में एक हफ्ते चली थी रिसर्च

यह रिसर्च एक हफ्ते तक चली थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि इलाज के दौरान मरीज के शरीर की पोजिशन का भी प्रभाव पड़ता है। गलत तरह से लेटने पर शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। वेंटिलेटर पर लेटे कोरोना पीड़ित मरीज का ऑक्सीजन लेवल, फेफड़ों का आकार और एयर-वे प्रेशर जांचा गया। रिसर्च में सामने आया कि 7 मरीज कम से कम एक बार ही सीने के बल लेटे थे (प्रोन पोजिशन) में लेटे थे। वहीं, तीन ऐेसे थे जो प्रोन पोजिशन में लेटे थे, उन्हें इक्मो भी दिया जा रहा था। इक्मो एक तरह का लाइफ सपोर्ट सिस्टम है। इसके अलावा तीन की मौत हो गई थी।

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